वैसे चुनाव संख्या के हिसाब से भाजपा 309 निकायों में से 163 में जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर आगे है। कांग्रेस 103 पर है, लेकिन ये आंकड़े अधूरी सच्चाई हैं।

यहां करीब 10 हजार वार्ड में चुनाव हुए, जिसमें भाजपा ने करीब 4179 और कांग्रेस ने करीब 3612 सीटें जीतीं हैं। वहीं निर्दलीयों ने 2273 से ज्यादा वार्ड अपने नाम किए हैं।

निकाय चुनाव के ये परिणाम दोनों दलों के लिए चेतावनी भी हैं। ढाई साल बाद विधानसभा चुनाव हैं। जनता ने इससे पहले ही अलार्म बजा दिया है।

भाजपा के पारंपरिक गढ़-पाली और अजमेर में सेंध इस बात का संकेत हैं। उधर, आम आदमी पार्टी का बारां नगर परिषद में सबसे बड़े दल के रूप में जीतना चौंकाने वाला है।

एक और साफ ट्रेंड दिखता है, इस बार 2 केंद्रीय सहित राजस्थान के 4 कैबिनेट मंत्री और पूर्व सीएम गहलोत सहित कई कांग्रेसी अपने वार्ड में पार्टी को नहीं जितवा पाए। विधायक बनने का सपना देखने वाले प्रत्याशी पार्षद तक का चुनाव हार गए।

भाजपा हो या कांग्रेस, दोनों में ऐसे उम्मीदवार हैं, जिन्हें एक-एक वोट से भी संतुष्ट होना पड़ा। यानी खुद के वोट के अलावा कोई वोट नहीं मिला।

दर्जनों निकायों में निर्दलीय ही किंगमेकर बन गए हैं। ये परिणाम भविष्य के राजनीतिक समीकरणों की पुरानी परिभाषा को तोड़ देते हैं। गढ़ टूटे हैं, मिथक टूटे हैं और सबसे बड़ी बात-जनता ने साफ कह दिया है कि भरोसा किसी पार्टी पर नहीं, अपनी मर्जी पर है।

क्या इन चुनाव परिणामों पर जेन-जी का इंपेक्ट है? कांग्रेस के लिए क्या संभावना छिपी है? बड़े नेताओं का क्या होगा? राजस्थान के मंत्रिमंडल में फेरबदल की जो बातें हो रही हैं, उसमें इसका असर दिखेगा। जैसे राजनीतिक सवालों और मायनों को दस सवालों में समझते हैं…

भाजपा के लिए रिजल्ट के मायने क्या है?

प्रदेश में भाजपा की सरकार है। आमतौर पर यह माना जाता है कि प्रदेश में जिसकी सरकार होती है। शहरी सरकार भी उसकी ही होती है, लेकिन यह एकतरफा जीत नहीं है।

भाजपा ने चुनाव के दौरान ट्रिपल इंजन की सरकार का नारा भी दिया था। 10 निगम में से सीधे तौर पर 4 निगम भाजपा ने जीत लिए हैं।

भरतपुर में निर्दलीय किंगमेकर बनेंगे। अजमेर, पाली और जोधपुर में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। अगर यहां टूट-फूट हुई या निर्दलीय समर्थन में आए तो बीजेपी 7 से 8 बोर्ड बना लेगी। इसे भाजपा बड़ी जीत के रूप में भुनाएगी।

नगर परिषद में भी यही हाल है। यहां 47 में से 12 में भाजपा को बहुमत मिला है। 28 परिषद में निर्दलीय किंगमेकर हैं। ऐसे में यहां और नगर पालिकाओं में भाजपा जोड़-तोड़ करके नंबर को बड़ा कर ही लेगी।

क्या सरकार या पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है?

नहीं। शहरी सरकार के चुनाव दो साल की देरी से हुए हैं। लंबे समय तक प्रशासकों ने काम किया। ये माना जाता है कि चुने हुए जनप्रतिनिधि और अफसर के कामकाज के तरीके में अंतर होता है, ये अंतर वोटिंग पैटर्न से सीधा समझा जाता है।

सरकार और संगठन ने इस चुनौती को पहले भांप लिया और विधानसभा चुनाव की तर्ज पर माइक्रो प्लानिंग की। नतीजा ये हुआ कि कांग्रेस को ज्यादा सीटें जीतने से रोक लिया। बीजेपी की बढ़त बरकरार रख ली।

दूसरा ये चुनाव पूरी तरह स्थानीय मुद्दों और स्थानीय नेताओं के आधार पर लड़ा जाता है। सरकार और पार्टी के सामने बड़ी चुनौती नहीं है। क्योंकि विधानसभा और लोकसभा चुनाव में वोटिंग पैटर्न अलग होता है। दूसरा आमताैर पर ट्रेंड ये रहा कि सत्ताधारी पार्टी पूरा बहुमत नहीं जुटा पाने की बावजूद आमतौर पर मेयर, सभापति और अध्यक्ष भी ज्यादा बना ही लेती है।

सबसे बड़ा सवाल यही है, क्योंकि ये चुनाव सरकार के 3 साल के कामकाज पर जनता की मुहर पर तौर पर देखे जा रहे थे। लिहाजा चुनाव की रणनीति बनाने से लेकर धरातल पर उतारने को लेकर मुख्यमंत्री खुद सक्रिय रहे।

इस चुनाव के बाद चर्चा है कि ‘काकाजी’ ने रुख पलट दिया। दरअसल, राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने ज्यादातर रोड शो और सभाओं में कहा था कि ‘कांग्रेस के लोग कहते थे कि इनके काकाजी भी वन स्टेट वन इलेक्शन नहीं करवा पाएंगे। अब देख लीजिए, आपके काकाजी ने वन स्टेट-वन इलेक्शन करवा दिए हैं।’

राजस्थान के इतिहास में पहली बार एक साथ निकाय चुनाव हुए। पहली बार पार्षदों को जिताने के लिए मुख्यमंत्री खुद चुनाव मैदान में उतरे और रोड शो करने के साथ जनसभाएं कीं। विरोधी दलों ने खूब तंज कसे और चटकारे लिए।

कांग्रेस के पास कई मुद्दे होने के बावजूद भाजपा ने 10 में से 4 निगम में सीधे तौर पर बहुमत जुटा लिया। राजस्थान की राजनीति में बाबोसा, जादूगर और मैडम के नाम की चर्चा होती आई है, लेकिन इस बार काकाजी की एंट्री ने हवा का रुख बदला।

बड़े नेताओं के गढ़ में पार्टी की हार हुई है। इसका फायदा विपक्षी दल उठाएंगे। जैसे, प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ के गृह जिले में पार्टी हार गई। विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी के चुनाव में सक्रिय होने के बावजूद 36 सालों बाद भाजपा पूर्ण बहुमत नहीं जुटा सकी।

जोधपुर में भी भाजपा और कांग्रेस बराबरी पर खड़े हैं। वसुंधरा के गढ़ में पार्टी हार गई। कई मंत्रियों के इलाकों में भी पार्टी हार गई। ऐसे में बूथ मैनेजमेंट से लेकर पार्टी के पन्ना प्रमुख सिस्टम पर काम करना होगा।

चुनावों का राजस्थान राजनीति में आगे क्या असर देखने को मिलेगा?

मंत्रिमंडल विस्तार में मुख्यमंत्री और संगठन को अब काफी छूट मिल जाएगी। क्योंकि मंत्रियों और विधायकों की परफॉर्मेंस और निकाय चुनावों के नतीजों से परफॉर्मेंस आंकने का आधार मिल जाएगा। ऐसे में पंचायतों के चुनाव के बाद मंत्रियों का प्रमोशन, डिमोशन या बदलाव होना तय माना जा रहा है।

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