12-13 सितंबर को दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स (BRICS) समिट से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के साथ द्विपक्षीय बातचीत करेंगे।
दिल्ली में 12-13 सितंबर को होने वाली BRICS समिट से ठीक पहले यानी कल शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच अहम द्विपक्षीय बैठक होगी। पुतिन कल ही दिल्ली पहुंचेंगे। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन भी शुक्रवार को दिल्ली पहुंचेंगे और पीएम मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय बात होगी।
12 सितंबर को दिल्ली आ रहे राष्ट्रपति शी जिनपिंग
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के शनिवार को यानी 12 सितंबर को दिल्ली आएंगे और रविवार को जाने से पहले उनकी मोदी के साथ द्विपक्षीय बातचीत की उम्मीद है। यह 2019 के बाद शी की पहली भारत यात्रा होगी। शी अक्टूबर 2019 में भारत आए थे। इसके बाद 2020 में ईस्टर्न लद्दाख में भारत और चीनी सेना के बीच गलवान में हिंसक झड़प हुई और इसने दोनों देशों के रिश्तों को पूरी तरह बदल दिया। धीरे धीरे रिश्ते बेहतर करने और विश्वास बहाली की सभी कोशिशें की जा रही हैं।
मोदी और पुतिन की बैठक अहम होगी क्योंकि भारत और रूस के रिश्ते एक तरफ लंबे समय से चली आ रही रणनीतिक साझेदारी पर टिके हैं तो दूसरी तरफ रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंध और भारत-अमेरिका संबंधों के बदलते समीकरण ने इस रिश्ते के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी की हैं।
इन मुद्दों पर हो सकती है मोदी-पुतिन की बातचीत
रूस के राष्ट्रपति के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव कह चुके हैं कि मोदी और पुतिन के बीच बेहद करीबी और व्यावहारिक संबंध हैं और दोनों नेता संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय मुद्दों और द्विपक्षीय संबंधों पर खुलकर बातचीत कर सकते हैं। मोदी-पुतिन की बातचीत में भारत-रूस व्यापार, ऊर्जा, रक्षा सहयोग, भुगतान व्यवस्था, तकनीकी सहयोग और यूक्रेन युद्ध जैसे मुद्दे प्रमुख रह सकते हैं।
ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहे भारत की कोशिश है कि समिट में दिल्ली घोषणापत्र (जॉइंट डिक्लरेशन) जारी हो सके। इसके लिए BRICS के शेरपा दिल्ली में लगातार बातचीत कर रहे हैं। लेकिन पश्चिम एशिया में जारी युद्ध ने घोषणापत्र की भाषा पर सहमति बनाना मुश्किल किया है। दिल्ली घोषणापत्र BRICS अध्यक्ष के रूप में भारत के कूटनीतिक प्रबंधन की परीक्षा भी है।
मतभेद को दूर करने के लिए हो रही कोशिश
ईरान और यूएई के बीच पश्चिम एशिया के संघर्ष को लेकर मतभेद ने घोषणापत्र की भाषा को पेचीदा बना दिया है। शेरपा स्तर पर इसी मतभेद को दूर करने और ऐसी भाषा तैयार करने की कोशिश हो रही है जिस पर सभी देश सहमत हो सकें। विदेश मामलों के जानकार सुरेश गोयल ने कहा कि जिस तरह जी-20 में दिल्ली घोषणापत्र आया था, उसी तरह ब्रिक्स समिट में भी दिल्ली घोषणापत्र आएगा।
इसकी काफी उम्मीद लग रही है। अगर जॉइंट डिक्लरेशन नहीं आ पाता है तो यह भारत के लिए थोड़ा मुश्किल स्थिति होगी। ईरान और यूएई दोनों ब्रिक्स का हिस्सा है और दोनों के बीच में काफी मतभेद है, इसलिए ये चुनौती होगा। यूक्रेन के बारे में भी चर्चा जरूरी होगी लेकिन उसमें कोई दिक्कत नहीं होगी।
