राहुल गांधी ने पुणे में छात्रों के बीच मनुस्मृति का संदर्भ देकर भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति पर सवाल उठाया, तो बीजेपी ने इसे धार्मिक भावनाओं से जोड़कर पलटवार शुरू कर दिया.
राहुल गांधी ने पुणे में छात्रों के बीच मनुस्मृति के हवाले से एक और विवाद को हवा दे दी है. उन्होंने कहा कि भारत में स्त्रियों को शुरू से ही दबाया जाता रहा है. मनुस्मृति के अध्याय पांच के 148वें श्लोक में कहा गया है कि एक स्त्री बचपन में पिता के संरक्षण में, जवानी में पति की छत्रछाया में और बुढ़ापे में बेटे की छांव तले रहती है. ऐसे में स्त्री पूरा जीवन किसी न किसी पुरुष की अधीनता में गुजारती है. छात्राओं में राहुल गांधी के इस भाषण से खुशी झलकी.
मगर राजनीतिकों, खासकर बीजेपी के तेवर चढ़ गये. उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी जान-बूझकर एक समुदाय विशेष की भावनाओं को आहत कर रहे हैं. जबकि यह सबको पता है कि कोई भी समाज अब लड़कियों को दबा कर नहीं रख सकता. उन्होंने अपनी प्रतिभा दिखाई है. खुद राहुल गांधी की दादी विश्व की वह दूसरी महिला थीं, जिन्होंने भारत जैसे विशाल देश की कमान संभाली.
मनुस्मृति ही अब बेमानी है
आज भी भारतीय उपमहाद्वीप ही अकेला ऐसा क्षेत्र है, जहां पर पिछले छह दशकों में पांच महिलाएं प्रधानमंत्री हुईं. यहां तक कि दो मुस्लिम देशों में तीन महिलाओं ने सरकार चलाई. जो अमेरिका समेत पूरी दुनिया में आज भी लगभग असंभव है. इसलिए मनुस्मृति अब बेमानी है. यह बात राहुल गांधी भी जानते हैं और सत्तारूढ़ दल बीजेपी भी. लेकिन दोनों को इसके मार्फत एक चुनावी मुद्दा मिल गया.
बीजेपी यह साबित करने में पूरी ताकत लगा देगी कि राहुल गांधी हिंदू विरोधी हैं इसलिए वे घड़ी-घड़ी हिन्दू धार्मिक ग्रंथों का अपमान करते हैं. दूसरी तरफ, राहुल गांधी ने मनुस्मृति पर हमला कर मुस्लिम, दलित, ओबीसी और महिलाओं के एक बड़े वर्ग को अपनी तरफ खींचने की कोशिश की है. 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर छात्रों के ऊपर हुए लाठीचार्ज के बाद से ये दोनों दल एकदम आमने-सामने आ गए हैं और रोज किसी न किसी मुद्दे पर तकरार बढ़ती जा रही है.
मोदी और राहुल के मध्य तिक्तता
लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के बीच तरार, परस्पर वाद-विवाद और तिक्तता कोई नई बात नहीं, होती ही रहती है. मगर राहुल गांधी और बीजेपी के बीच यह तिक्तता अब बहुत कटु स्तर पर आ गई है. दोनों ने एक-दूसरे को भिन्न-भिन्न धर्मों का नायक मान लिया है. सच्चाई एकदम उलट होती है. न तो बीजेपी का मतलब हिंदू धर्म है न राहुल गांधी अल्पसंख्यक और पीड़ित वर्ग के प्रवक्ता. लेकिन बातों के माध्यम से समुदायों के बीच खाई चौड़ी की जा रही है. इसमें दोनों बराबर के दोषी हैं. और इस लड़ाई में पार्टियों से अधिक हमला उनके नेताओं पर हो रहा है.
एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो दूसरी तरफ़ नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी. यह तिक्तता सुप्रिया सुले की बेटी की शादी के वक्त दिखाई पड़ी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी वहां पहुंचे. दोनों के बीच हेलो-हाय तक नहीं हुआ. जबकि प्रियंका और मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री से बातचीत की.
वंदे मातरम् के माध्यम से भी यही तकरार
इसी तरह स्वतंत्रता दिवस पर लाल किला पर हुए आजादी के जश्न में राहुल गांधी नहीं पहुंचे. उन्होंने कांग्रेस पार्टी के दफ्तर में यह जश्न मनाया और राष्ट्रगान का दर्जा प्राप्त वंदे मातरम् के सिर्फ दो ही श्लोक पढ़े. इस मामले में उनका कहना है कि इसके आगे के पदों में हिन्दू देवी-देवताओं की स्तुति है, जो अल्पसंख्यकों के लिए उचित नहीं है. यहां यह स्मरणीय है कि गत मई में जब तमिलनाडु में जोसफ विजय ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तब शपथ ग्रहण के पूर्व और बाद में वंदे मातरम् को पूरा गाया गया. मजे की बात कि जोसफ विजय स्वयं ईसाई समुदाय से हैं और तमिलनाडु में हिंदू लगभग 90 प्रतिशत हैं.
समाज की मुख्य धारा में बहुसंख्यक समाज की मान्यताओं को ही आम स्वीकृति मिलती है. अमेरिका से लेकर अन्य सेक्युलर देशों में भी ऐसी ही मान्यताएं हैं. भले वहां बहुत से लोग अनीश्वरवादी हों किंतु शपथ बाइबल पर हाथ रख कर कराई जाती है.
समाज को तोड़ने की कोशिश
इस तरह अब चलन से बाहर हो चुकी किसी संहिता के आधार पर पूरे एक समाज को पितृसत्तात्मक व्यवस्था का हामी बताना ताली बजाने और महफिल लूट लेने के लिए तो ठीक है. किंतु इसका असर समाज के भीतर कैसा पड़ेगा, यह न सोच पाना बचकानापन है. राहुल गांधी भी इस बात को समझते हैं और बीजेपी के आला नेता भी. इसके बावजूद वोट पाने के लिए इस तरह के करतब देश के भीतर कलह पैदा कर देंगे.
आज के समय न बीजेपी मनुस्मृति को कोई आचार-विचार या दंड विधान की अधिकृत पुस्तक मानती है न ही कांग्रेस तब मनुस्मृति का बचाव या उसका विरोध कर समाज के भीतर असंतोष पैदा करने की वजह क्या हो सकती है! चंद वोटों के लिए इतना गिर जाने की यह परंपरा 2014 से शुरू हुई. जब देश को दो समुदायों में बांट दिया गया था. मुस्लिम तब अलग-थलग पड़ गए थे और उसी मुस्लिम समुदाय के अलगाव को राहुल गांधी ने सहेज लिया.
विकास का अर्थ है निरंतर आगे की तरफ बढ़ना
अभी 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने PDA का नारा दिया था. तब उनके इस PDA का मतलब था पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक. किंतु उन्होंने किसी जाति या समुदाय को टारगेट नहीं किया. इसलिए उनका PDA हिट कर गया. इसके उलट राहुल गांधी बीजेपी के प्रति अपनी आक्रामकता की वजह से सीधे-सीधे हिंदू धर्मग्रंथों की पुरानी बातों को सामने ला कर निशाना साधते हैं. जिसके चलते फौरी तौर पर तो तालियां मिलती हैं, लेकिन इन बातों का दुष्प्रभाव समाज को छिन्न-भिन्न कर देगा.
समाज निरंतर आगे को बढ़ता है. जब मनुस्मृति के श्लोक गढ़े जा रहे होंगे तब समाज आज की तरह न उन्नत था न उसकी मान्यताएं वैसी थीं, जैसी कि आज हैं. उस समय के समाज की आज से तुलना करने का अर्थ है, हम वैचारिक रूप से पंगु हो चुके हैं. तब का समाज अब मिथक हो चुका है. इसलिए उन बातों को लाना गड़े मुर्दे उखाड़ने जैसा है.
पीढ़ी, सोच और मान्यताएं बदलीं
बीजेपी को भी ऐसी बातों पर प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करना चाहिए. क्योंकि यदि आप ऐसा करते हैं तो लगेगा आप आज भी उन्हीं मान्यताओं के हामी हो. वे मान्यताएं अब खत्म हैं. हर 25 वर्ष में पीढ़ी बदल जाती है, सोच बदल जाती है और मान्यताएं भी. आज न स्त्रियां पीछे हैं न समाज में कोई जाति. हर जाति, समाज और स्त्रियों ने भी अपनी लगन, श्रम और मेधा से शिखर का स्थान पाया है. इसलिए किसी धर्मग्रंथ का हवाला देना पूरी तरह गलत है.
अभी हाल तक हरियाणा में लड़की का पैदा होना एक अपराध था. लोग लिंग परीक्षण करवा कर गर्भ में ही शिशु की हत्या करवा देते थे. उसी हरियाणा में आज लड़कियां ही उसका माथा ऊंचा किए हैं. इसलिए अतीत का हवाला देकर आज हरियाणा के समाज पर टिप्पणी करना तो एक पूरे समाज को अपमानित करना है. धार्मिक पुस्तक वैसे भी हिंदुओं के लिए कोई पूज्य नहीं हैं पर विवाद खड़े करना मकसद नहीं होना चाहिए.
मतदाता युवा होगा पर नेता पुराना!
दरअसल लड़ाई सन् 2000 के बाद पैदा हुए बच्चों को लेकर है. आने वाले लोकसभा चुनाव तक 2010 तक पैदा हुए बच्चे वोट देने के अधिकारी होंगे. इनको जोड़ना और इनसे संपर्क बनाये रखना हर दल की कोशिश है. पर दिक्कत यह है कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों के नायकों की उम्र बढ़ती जा रही है. 2029 तक राहुल गांधी 59 के हो जाएंगे और नरेन्द्र मोदी 79 के. तब कैसे उनसे संवाद किया जाए! इसका एक ही तरीका है, हर पुरानी चीज को खंडित किया जाए, उसे बदनाम किया जाए. बीजेपी के निशाने पर नेहरू रहते हैं तो राहुल गांधी के निशाने पर हिंदू धर्मग्रंथ.
