लखनऊ के प्रतिष्ठित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में कथित धर्मांतरण, महिला डॉक्टरों के उत्पीड़न और संस्थान के भीतर शिकायतों को दबाने के आरोपों ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है।
उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (STF) की सात पन्नों की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद करीब 12 से 13 डॉक्टरों और कर्मचारियों की भूमिका जांच के दायरे में आ गई है।
मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने 30 अक्टूबर 2026 को KGMU प्रशासन को संबंधित लोगों के खिलाफ नियमों के तहत कार्रवाई करने और उसकी रिपोर्ट शासन को भेजने का निर्देश दिया है।
अब विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद की बैठक 6 नवंबर को बुलाई गई है। इसमें जांच समिति गठित करने और संबंधित डॉक्टरों की प्रशासनिक जिम्मेदारियों पर फैसला होने की संभावना है।
केजीएमयू में धर्मांतरण प्रकरण को लेकर एसटीएफ की सात पेज की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन में हलचल तेज हो गई है। रिपोर्ट में करीब 12 डॉक्टरों के नाम शामिल हैं। इनमें कई ऐसे हैं, जो केजीएमयू से बाहर बड़े संस्थानों में अहम पदों पर तैनात हैं। एक डॉक्टर कुलपति के पद पर भी हैं। वहीं, कुछ केजीएमयू में विभागाध्यक्ष हैं, जबकि कुछ अगले एक से दो महीने में इस पद पर नियुक्त होने वाले हैं।
एसटीएफ की रिपोर्ट के आधार पर केजीएमयू प्रशासन सभी संबंधित डॉक्टरों के खिलाफ अनुशासनात्मक जांच शुरू करने की तैयारी में है। इसके लिए अगले सप्ताह कार्यपरिषद की आपात बैठक बुलाई जाएगी। इसमें आरोपों की जांच के लिए कमेटी गठित करने पर फैसला लिया जाएगा।
बैठक में इस पर भी विचार होगा कि जांच पूरी होने तक संबंधित डॉक्टर विभागाध्यक्ष और अन्य प्रशासनिक पदों पर बने रहेंगे या नहीं। ऐसे में आने वाले दिनों में विश्वविद्यालय के कई अहम प्रशासनिक पदों पर बदलाव हो सकते हैं। केजीएमयू के प्रवक्ता डॉ. केके सिंह ने बताया कि कार्यपरिषद की बैठक बुलाकर पूरा मामला रखा जाएगा। इसके बाद आगे की कार्रवाई तय होगी।
एसटीएफ की रिपोर्ट में डॉक्टरों के कामकाज और व्यवहार को लेकर भी गंभीर टिप्पणियां की गई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, संबंधित डॉक्टरों पर अपने धर्म के लोगों को प्राथमिकता देने के आरोप हैं। इलाज, विभागीय जिम्मेदारियां सौंपने और ड्यूटी लगाने तक में धर्म के आधार पर पक्षपात किया जाता था। रिपोर्ट में अपने धर्म के विशेषज्ञों को तरजीह देने का भी जिक्र है।
KGMU जैसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान में सामने आया यह विवाद केवल कुछ डॉक्टरों पर लगे आरोपों तक सीमित नहीं है। इसमें महिला कर्मचारियों की सुरक्षा, संस्थान की शिकायत निवारण व्यवस्था और वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही जैसे महत्वपूर्ण सवाल भी शामिल हैं।
फिलहाल 6 नवंबर की कार्यपरिषद बैठक पर सबकी नजर है। उसी के बाद पता चलेगा कि करीब 13 डॉक्टरों के खिलाफ जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है।
