जवाहर बाग कांड (मथुरा, 2 जून 2016) उत्तर प्रदेश के सबसे गंभीर प्रशासनिक और पुलिस-संघर्ष मामलों में से एक था। इसमें पुलिस अधिकारियों समेत कई लोगों की जान गई और करीब दो साल से सरकारी जमीन पर चला आ रहा कब्जा हिंसक कार्रवाई में बदल गया। नीचे घटनाक्रम को तथ्य और विवाद—दोनों पहलुओं के साथ समझिए।
जवाहर बाग में कब्जा कैसे हुआ?
मथुरा शहर के बीचोंबीच लगभग 280 एकड़ का जवाहर बाग सरकारी भूमि/सार्वजनिक पार्क था। मार्च 2014 के आसपास रामवृक्ष यादव और उसके समर्थकों ने वहां डेरा डालना शुरू किया। वे “स्वाधीन भारत विधिक सत्याग्रह” जैसे नामों के तहत आंदोलन कर रहे थे। धीरे-धीरे वहां बड़ी संख्या में लोग जमा हो गए और कब्जा स्थायी रूप लेने लगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में भी इस लंबे अवैध कब्जे और प्रशासन की कार्रवाई में देरी का उल्लेख मिलता है।
रिपोर्टों और अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, कब्जा करने वालों ने परिसर के अंदर अपनी व्यवस्था बना ली थी। सरकारी कार्यालयों पर भी कब्जे और सरकारी रिकॉर्ड नष्ट किए जाने की बातें न्यायिक रिकॉर्ड में दर्ज हैं। I
2. रामवृक्ष यादव कौन था?
रामवृक्ष यादव इस समूह का प्रमुख नेता था। उसके समर्थकों का संगठन स्वाधीन भारत सुभाष सेना (SBSS) के नाम से भी सामने आया।
पुलिस के अनुसार जवाहर बाग में समय के साथ बड़ी संख्या में हथियार और विस्फोटक जमा किए गए थे। बाद की कार्रवाई में पुलिस ने हथियार और कथित विस्फोटक सामग्री बरामद करने की बात कही।
कुछ रिपोर्टों में जवाहर बाग के भीतर एक तरह की समानांतर व्यवस्था/सरकार चलाने के आरोप भी लगाए गए थे।
3. प्रशासन इतने समय तक कार्रवाई क्यों नहीं कर पाया?
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा विवाद है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2017 के फैसले में दर्ज रिकॉर्ड के मुताबिक प्रशासन को कब्जे की जानकारी थी और कई बार हस्तक्षेप की कोशिश भी हुई थी। एक मौके पर अधिकारियों की टीम को बड़ी संख्या में लोगों ने घेर लिया और अधिकारियों को पीछे हटना पड़ा।
अदालत के सामने यह आरोप भी रखा गया कि प्रशासन और पुलिस ने समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं की और इसी वजह से स्थिति बिगड़ती चली गई। हाईकोर्ट ने अंततः मामले की जांच CBI को स्थानांतरित करने का आदेश दिया। I
4. हाईकोर्ट का आदेश
2 जून 2016 को पुलिस और प्रशासन की टीम जवाहर बाग पहुंची।
लेकिन वहां मौजूद लोगों ने पुलिस का विरोध किया और स्थिति अचानक हिंसक हो गई।
5. 2 जून 2016 को वास्तव में क्या हुआ?
जब पुलिस टीम कब्जा हटाने पहुंची तो कब्जाधारियों की ओर से पथराव और गोलीबारी की गई। पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी भी इसकी चपेट में आए।
सबसे दुखद घटना यह थी कि:
- एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी की हत्या हो गई।
- फरह थाने के एसएचओ संतोष कुमार यादव भी मारे गए।
- कई अन्य पुलिसकर्मी घायल हुए।
- जवाबी पुलिस कार्रवाई में कब्जाधारियों के भी बड़ी संख्या में लोग मारे गए।
मृतकों की संख्या को लेकर शुरुआती रिपोर्टों में अंतर रहा। तत्कालीन रिपोर्टों में 24 मौतें बताई गईं, जबकि बाद के न्यायिक रिकॉर्ड और कुछ रिपोर्टों में संख्या 28/29 तक दर्ज हुई। इसलिए अलग-अलग स्रोतों में आंकड़ा अलग दिखाई देता है। IIndian Kanoon+1
6. आग और विस्फोट का क्या मामला था?
हिंसा के दौरान जवाहर बाग में आग और विस्फोट हुए।
पुलिस का कहना था कि वहां रखे गैस सिलेंडरों तथा अन्य सामग्री में आग लगने से कई लोग मारे गए। पोस्टमार्टम से संबंधित शुरुआती रिपोर्टों में 19 शवों में गोली लगने के बजाय जलने, लाठी और पथराव से हुई चोटों का उल्लेख किया गया था।
यानी यह केवल गोलीबारी का मामला नहीं था—पथराव, आग, विस्फोट और पुलिस कार्रवाई, सभी ने मिलकर मौतों की संख्या बढ़ाई।
7. रामवृक्ष यादव का क्या हुआ?
हिंसा के बाद पुलिस ने दावा किया कि रामवृक्ष यादव भी मारा गया, संभवतः आग में झुलसने से।
लेकिन उसके शव की पहचान को लेकर गंभीर सवाल उठे। मथुरा की अदालत ने DNA परीक्षण कराने का आदेश दिया क्योंकि परिवार के किसी सदस्य ने शव की पहचान नहीं की थी।
इसलिए शुरुआती दौर में उसकी मौत को लेकर काफी विवाद रहा।
8. क्या अखिलेश यादव सरकार जिम्मेदार थी?
यह हिस्सा राजनीतिक आरोप और स्थापित तथ्य के बीच अलग-अलग करके देखना जरूरी है।
उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव थे। घटना के बाद विपक्ष ने कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक विफलता के लिए उनकी सरकार को जिम्मेदार ठहराया।
लेकिन यह कहना कि “अखिलेश यादव ने खुद जवाहर बाग कब्जा करवाया” या उन्होंने व्यक्तिगत रूप से पुलिस को कार्रवाई से रोका—इसे बिना ठोस प्रमाण के स्थापित तथ्य की तरह कहना उचित नहीं होगा।
दूसरी तरफ, इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2017 के फैसले में प्रशासन की समय पर प्रभावी कार्रवाई न करने पर गंभीर सवाल दर्ज हुए और अदालत ने जांच CBI को सौंपने का आदेश दिया। IIndian Kanoon
इसलिए अधिक सटीक निष्कर्ष यह है कि अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल में यह घटना हुई और प्रशासनिक विफलता की जांच का सवाल उठा, लेकिन व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी का आरोप अलग विषय है और उसे प्रमाण के आधार पर ही देखा जाना चाहिए।
9. कितने लोगों पर मुकदमा चला?
घटना के बाद पुलिस ने बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया।
सितंबर 2016 में पुलिस ने जवाहर बाग हिंसा से जुड़े मामलों में 101 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। इनमें रामवृक्ष यादव की पत्नी पूनम और उसके सहयोगियों के नाम भी शामिल थे।
10. सबसे बड़ा सवाल—इतना बड़ा हथियारों का जमावड़ा कैसे हुआ?
यही जवाहर बाग कांड की सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक विफलताओं में से एक माना गया।
जवाहर बाग के आसपास ही पुलिस और प्रशासन के महत्वपूर्ण कार्यालय मौजूद थे। इसके बावजूद लगभग दो वर्षों तक इतने बड़े समूह का वहां रहना, उसकी गतिविधियां और कथित हथियारों का जमावड़ा रोकना प्रशासन के लिए गंभीर सवाल बना। हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में भी इसी तरह की प्रशासनिक विफलता के आरोपों पर विस्तार से चर्चा हुई। I
संक्षेप में पूरी कहानी
2014: रामवृक्ष यादव के नेतृत्व में लोगों ने जवाहर बाग में डेरा/कब्जा शुरू किया।
2014–16: कब्जा बढ़ता गया और समूह ने वहां अपनी व्यवस्था विकसित कर ली।
2016: प्रशासन और अदालत के स्तर पर कब्जा हटाने की प्रक्रिया तेज हुई।
20 मई 2016: हाईकोर्ट के आदेश के बाद कब्जा हटाने का रास्ता साफ हुआ।
2 जून 2016: पुलिस कब्जा हटाने पहुंची → पथराव और गोलीबारी → एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी और एसएचओ संतोष यादव सहित कई लोगों की मौत।
बाद की कार्रवाई: जवाहर बाग खाली कराया गया, बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां हुईं और हथियार/अन्य सामग्री बरामद होने की बात सामने आई।
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2017: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले की जांच CBI को सौंपने का आदेश दिया।
